एक अर्से बाद
एक अर्से बाद वो नजरें दिखी.. मखमली चादर सी पलकों तले छुपी| खिलखिलाती वो और उसकी हसी, मानो कहती हो चलो जी भरके जी ले वो सारे पल हसीन... यूँही गुज़र रहा था पुरानी गलियों से तो. एक अर्से बाद वो नजरें दिखी | सही गलत से परे, उन नज़रो तले, दुनिया बसा करती थीं.. हर फिक्र से बेपरवाह होता, जब नज़रे उन नज़रो पर टिका करती थीं.. खूबसूरती, मासूमियत, सच्चाई और प्यार वयार् की कमी तो अब भी नहीं, पर उन नज़रो की तो बात ही अलग हुआ करती थीं | जब पुरानी गलियों में भटक रहा था यूही, तो.. यादों से ओझल एक अर्से बाद वो नजरें दिखी.. -अनुभव कुमार मिश्रा सितंबर 9,2014