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एक अर्से बाद

एक अर्से बाद वो नजरें दिखी.. मखमली चादर सी पलकों तले छुपी| खिलखिलाती वो और उसकी हसी,  मानो कहती हो चलो जी भरके जी ले वो सारे पल हसीन...  यूँही गुज़र रहा था पुरानी गलियों से तो.  एक अर्से बाद वो नजरें दिखी | सही गलत से परे, उन नज़रो तले,  दुनिया बसा करती थीं..  हर फिक्र से बेपरवाह होता,  जब नज़रे उन नज़रो पर टिका करती थीं.. खूबसूरती, मासूमियत, सच्चाई और प्यार वयार् की कमी तो अब भी नहीं, पर उन नज़रो की तो बात ही अलग हुआ करती थीं | जब पुरानी गलियों में भटक रहा था यूही, तो.. यादों से ओझल एक अर्से बाद वो नजरें दिखी.. -अनुभव कुमार मिश्रा सितंबर 9,2014

अभी बहुत आग है बाकी

"अभी बहुत आग है बाकी" भारत तेरी आँखों में जाने ये कैसा पानी है, पीडा इतनी माँ , जान हुई हैरानी है । तू क्यों  समझती  नहीं  है तेरा कोई साथी , एक आवाज़ तो दे माँ ,  अभी बहुत आग है बाकि । चीर हरण , खून खराबा और  भ्रष्टाचार का साया , गोरो के काल से यही  तो चलता आया  आज़ादी के बाद हमने अबतक क्या पाया? पहले गोरो   ने अब हमने माँ  को बस यु ही रुलाया । प्रण  कर आज , नम हो न ये आँखें कदापि , बदलेंगे हम ,बदलेगा  भारत अभी बहुत आग   है बाकि , अभी बहुत आग   है बाकि। आज़ादी के मतवालो जैसे  हम भी जंग पे जाएंगे  बुराइयो को नष्ट कर एक बेहतर समाज बनाएँगे माँ की आज़ादी के लिए कुर्बान तो हो सके , माँ के आसु को ही पोंछ कर , एक नया उजियारा लाएंगे एक नया उजियारा लाएंगे । ये करने को हमे  चाहिए कोई वर्दी या खाकी ये करने को हम सब है काफी अभी बहुत आग   है बाकि , अभी बहुत आग   है बाकि।  जय हिन्द ।