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क्यों मैं बड़ा हो गया  बचपन कितना अच्छा था, सबका मन कितना सच्चा था , हर डगर तब आसान सी लगती थी  हाथो में साईकिल का जब चक्का था  उम्र कितनी  भी कच्ची थी , हौसला पर बारूद सा पक्का था ! पर जाने अब ऐसा क्या हो गया , की खुद पे विश्वास मैं क्यों खो गया  क्यों मैं बड़ा हो गया ? जब पहली दौड़ लगायी थी  जब पहली पतंग उड़ाई थी  जब, जब टहनी टहनी  यूँ  कूद लगायी थी  जब की क्रिकेट में मैंने औगुवाई थी  या जब  पहली बार कलम उठायी थी  तब , न कोई उम्मीद थी , न था किसी का डर।  क्योंकि उम्र तो कच्ची थी  पर हौसला था निडर  पर जाने अब ऐसा क्या हो गया , की दृढ़ निश्चय मैं खो गया ,  क्यों मैं बड़ा हो गया ? हर वो चीज़ जो बालपन में आसान सी लगती थी  अब न जाने मुश्किल सी क्यों हो गयी? अपनी ही काबिलियत पे मुझे अब  शक  क्यों हो गया  बच्चा जी अच्छा था , न जाने कब , क्यों, कैसे मैं बड़ा हो गया  जाने क्यों मई बड़ा हो गया ? ...