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एक है हर इंसान

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एक ने पहनी टोपी हुई, एक पे टीके का निशान, एक के तन पे सूट बूट है एक की पगड़ी है शान! एक के दिल में मूरत है, एक के दिल में हैं रहमान, एक का दिल है गिरजाघर में, एक के दिल में गुरु महान। रंग ढंग और रहन सहन सबका अलग अपना अभिमान क्यों तू कहती एक हैं सब माँ, हूँ मैं बड़ी हैरान! जब जात पात और धर्म के नाम पर मरता हर पल  हर इंसान, सहिष्णुता और अंखडता नही अब, सरोकार भी नदारद है, ये धर्म ही सबका,  धर्म ही सबका कारक है। हस कर मुकुरकर, थोड़ा यूँ ही गुदगुदा कर, ममता ने पगली को समझाया, सिर्फ दस बसंत हुए तुझे अभी तो, शतकों तक ये गुत्थी न कोई सुलझा पाया, एक कि टोपी दिखी यूँ सभी को, एक का दिखा निशान, एक के सूट को सबने ताडा, एक को पगड़ी का मान! एक ही तो है हर इंसान जिसकी बोली भी एक सी, रंग भी एक और एक ही भारत का गुमान! रक्त एक है, धर्म एक है, एक ही है भगवान, एक सा दिल है, एक सी बोली एक ही तो है मुस्कान, हिन्दू हो, सिख हो या हो ईसाई,या हो ही ना क्यों भाई मुसलमान! ~ताबिर~ 21 नवम्बर 2017