परछाई
यूँ ही महरूम बैठे है , उदासी सी छई है दर्द का चादर ओढ़े जैसी ये तन्हाई है ख़ुशी के सजदे में कबसे न झुका और अब इन् राहो पे एक वीरानी सी खायी है पल पल एक सन्नाटा है बस कल की गुफ्तगू फ़िज़ा में समायी है खुद का क्या पैगाम होगा कल , जानने की आरज़ू सी दिल में आयी है खैर अब तो मेहरूमियत से इश्क़ है और कोई जुस्तजू भी नहीं इस जहाँ में तो अब मेरा हमसफ़र , मेरी हमनफ़ज़ और कोई नहीं बस मेरी परछाई है बस मेरी परछाई है यूँ ही महरूम बैठे हैं ! अनुभव कुमार मिश्र 26 नवम्बर 2014