परछाई
यूँ ही महरूम बैठे है ,
उदासी सी छई है
दर्द का चादर ओढ़े
जैसी ये तन्हाई है
ख़ुशी के सजदे में कबसे न झुका
और अब इन् राहो पे एक वीरानी सी खायी है
पल पल एक सन्नाटा है
बस कल की गुफ्तगू फ़िज़ा में समायी है
खुद का क्या पैगाम होगा कल , जानने की आरज़ू सी दिल में आयी है
खैर अब तो मेहरूमियत से इश्क़ है
और कोई जुस्तजू भी नहीं
इस जहाँ में तो अब मेरा हमसफ़र , मेरी हमनफ़ज़
और कोई नहीं बस मेरी परछाई है
बस मेरी परछाई है
यूँ ही महरूम बैठे हैं !
अनुभव कुमार मिश्र

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