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सोचा न था

एक दिन दुनिया मेरी पलट जाएगी एक दिन तक़दीर मेरी कुछ यूँ बदल जाएगी की जेवन के सफ़र में मुस्कराहट आएगी सच करने का जूनून होगा सपना कुछ उसका, कुछ अपना ऐसा सोचा न था| दांव वो लगाएगी जीत मैं जाऊंगा, वो कदम से कदम मिलाएगी और मैं हर गम को हराऊंगा सांसे तो थी पर उसके आते ही जीना सिख जाऊंगा उसकी जीत पर मैं यूँ इतराउंगा ऐसा सोचा न था मेरी उम्मीदों को नयी उड़ान मिल जाएगी उसकी नज़रो में मेरी दुनिया समाएगी यूँ नाम के साथ सपने भी एक हो जाएंगे और इरादे उसके आने से ऐसे नेक हो जाएगे सोचा न था| एक दिन दुनिया मेरी पलट जाएगी एक दिन तकदीर मेरी कुछ यूँ बदल जाएगी ऐसा सोचा न था अनुभव कुमार मिश्र 'ताबीर' 24/12/2016

परछाई

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यूँ ही महरूम बैठे है , उदासी सी छई है  दर्द का चादर ओढ़े  जैसी ये तन्हाई है  ख़ुशी के सजदे में कबसे न झुका  और अब इन् राहो  पे एक वीरानी सी खायी है  पल पल एक सन्नाटा है  बस कल की गुफ्तगू फ़िज़ा में समायी है  खुद का क्या पैगाम होगा कल  , जानने की आरज़ू सी दिल में आयी है  खैर अब तो मेहरूमियत से इश्क़ है  और कोई जुस्तजू भी नहीं  इस जहाँ में तो अब मेरा हमसफ़र , मेरी हमनफ़ज़  और कोई नहीं बस मेरी परछाई है  बस मेरी परछाई है  यूँ ही महरूम बैठे हैं ! अनुभव कुमार  मिश्र  26 नवम्बर 2014
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क्यों मैं बड़ा हो गया  बचपन कितना अच्छा था, सबका मन कितना सच्चा था , हर डगर तब आसान सी लगती थी  हाथो में साईकिल का जब चक्का था  उम्र कितनी  भी कच्ची थी , हौसला पर बारूद सा पक्का था ! पर जाने अब ऐसा क्या हो गया , की खुद पे विश्वास मैं क्यों खो गया  क्यों मैं बड़ा हो गया ? जब पहली दौड़ लगायी थी  जब पहली पतंग उड़ाई थी  जब, जब टहनी टहनी  यूँ  कूद लगायी थी  जब की क्रिकेट में मैंने औगुवाई थी  या जब  पहली बार कलम उठायी थी  तब , न कोई उम्मीद थी , न था किसी का डर।  क्योंकि उम्र तो कच्ची थी  पर हौसला था निडर  पर जाने अब ऐसा क्या हो गया , की दृढ़ निश्चय मैं खो गया ,  क्यों मैं बड़ा हो गया ? हर वो चीज़ जो बालपन में आसान सी लगती थी  अब न जाने मुश्किल सी क्यों हो गयी? अपनी ही काबिलियत पे मुझे अब  शक  क्यों हो गया  बच्चा जी अच्छा था , न जाने कब , क्यों, कैसे मैं बड़ा हो गया  जाने क्यों मई बड़ा हो गया ? ...
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 माँ कैसे करू शुक्रिया तुम्हे, दुनिया जो तुमने दिखाई है, माँ तू कितनी भोली,इतनी प्यारी मेरी कमियों को प्यार से ढकते आई है । पापा ने जब भी बेंत उठाया तुमने ही लड़ी मेरी लड़ाई है इतना प्यार , मोह का पिटारा माँ तू कहा से लायी है? माँ तू कितनी भोली,इतनी प्यारी तू ही मेरी ज़िन्दगी, तू ही पूरी कमाई है। कैसे करू शुक्रिया तुम्हे, मुझे ऊँगली पकड़ चलना जो  सिखाया है रहो में जब भी पड़ा अकेला, नज़रो ने बस तुम्हे ही पाया है एक कदम ना चला तेरे   बिन तेरे बिना चलना भी नगवारा है माँ , एक तू ही तो मेरा सहारा है! डाटा भी , मारा भी , ममता का रस भी बहाया है खुद पढ़ पढ़ के माँ , तूने मुझे पढ़ना सिखाया है, सारे संस्कार दिए तुमने ही मुझे माँ, रिश्ते निभाना भी तो तुमने  ही सिखाया है! कैसे करू शुक्रिया तुम्हे माँ , उस थाली के खाने से , भूख लगी भी हो तुम्हे जो, पर, पहला निवाला मुझे ही खिलाया है थोड़े से बुखार में जगी सारी रात मेरे खातिर तुम्हे पाकर माँ मैंने, साक्षात् भगवान को पाया है टीचर, डॉक्टर, कौंसलर और न जाने क्या क्या सब का किरदार माँ तुमने निभाया...
छलकते मोती ! आँखों से छलकते मोती , आज गहरे और हो गए  रही ना ख़ुशी ना वो खुशनुमा पल..  दिल के ज़ख्म बस साथ हमारे रह गए। ......!  हुआ कुछ ऐसा की ना हो बयां  आज रह गयी मेरी मंज़िल अधूरी वहाँ  जाने क्यों  गयी ज़िन्दगी कुछ ऐसे  मेरे सारे अरमान बस धरे के धरे रह गए....  तू होती मेरे साथ , तो मैं आज न ना रोता  तेरे मुझपे किये विश्वास को कभी ज़ाया न होने देता  तेरे जाने से यूँ तनहा हम रह गए , ए ज़िन्दगी तू तो आगे बढ़ के चल दी , हम तो आज भी वही तनहा रह गए !! तनहा रह गए.....  और आँखों से छलकते मोती गहरे आज  हो गए !! - अनुभव कुमार मिश्र 25/1 /2014 

एक अर्से बाद

एक अर्से बाद वो नजरें दिखी.. मखमली चादर सी पलकों तले छुपी| खिलखिलाती वो और उसकी हसी,  मानो कहती हो चलो जी भरके जी ले वो सारे पल हसीन...  यूँही गुज़र रहा था पुरानी गलियों से तो.  एक अर्से बाद वो नजरें दिखी | सही गलत से परे, उन नज़रो तले,  दुनिया बसा करती थीं..  हर फिक्र से बेपरवाह होता,  जब नज़रे उन नज़रो पर टिका करती थीं.. खूबसूरती, मासूमियत, सच्चाई और प्यार वयार् की कमी तो अब भी नहीं, पर उन नज़रो की तो बात ही अलग हुआ करती थीं | जब पुरानी गलियों में भटक रहा था यूही, तो.. यादों से ओझल एक अर्से बाद वो नजरें दिखी.. -अनुभव कुमार मिश्रा सितंबर 9,2014

अभी बहुत आग है बाकी

"अभी बहुत आग है बाकी" भारत तेरी आँखों में जाने ये कैसा पानी है, पीडा इतनी माँ , जान हुई हैरानी है । तू क्यों  समझती  नहीं  है तेरा कोई साथी , एक आवाज़ तो दे माँ ,  अभी बहुत आग है बाकि । चीर हरण , खून खराबा और  भ्रष्टाचार का साया , गोरो के काल से यही  तो चलता आया  आज़ादी के बाद हमने अबतक क्या पाया? पहले गोरो   ने अब हमने माँ  को बस यु ही रुलाया । प्रण  कर आज , नम हो न ये आँखें कदापि , बदलेंगे हम ,बदलेगा  भारत अभी बहुत आग   है बाकि , अभी बहुत आग   है बाकि। आज़ादी के मतवालो जैसे  हम भी जंग पे जाएंगे  बुराइयो को नष्ट कर एक बेहतर समाज बनाएँगे माँ की आज़ादी के लिए कुर्बान तो हो सके , माँ के आसु को ही पोंछ कर , एक नया उजियारा लाएंगे एक नया उजियारा लाएंगे । ये करने को हमे  चाहिए कोई वर्दी या खाकी ये करने को हम सब है काफी अभी बहुत आग   है बाकि , अभी बहुत आग   है बाकि।  जय हिन्द ।