नियति को ये मंज़ूर नही

नियति को ये मंज़ूर नही
दो दिलो का ये कसूर नही

जोशीले तन और मन से उन्होंने ,
संग सांसो के वादे खाये थे
छोड़ कही उस तन्हाई को,
संग जीत के गोते लगाए थे
अंधियारे से उजियारे तक,
खुशियो के हर एक गलियारे तक
प्यार व्यार ही फैलाये थे!

प्रेम के वो प्रचारक थे,
तेरे मेरे सुधारक थे,
जिस सदी में जिस्म का मोल नही,
वो राधा कृष्ण कहलाये थे!

पर भूल गए एक सत्य को वो भी

पर भूल गए एक सत्य को वो भी,
की कृष्णा राधा के कभी हुए नही
मन तो एक ही था, तन कभी एक हुए नही !

उस समय भी नियति जीती थी
उसपे किसी का जोर नही,
नियति को ये मंज़ूर नही,
दो दिलो का ये कसूर नही

~ताबीर~
3 - नवंबर - 2017

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