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Showing posts from 2018

वीरानी सड़क

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खिड़कियों से बाहर ,पेड़ो की टहनियों से वो हवा कुछ अलग सी मालूम होती है! पत्तियों की सरसराहट में कोई , अफवाहि तूफान का पैगाम सा लगता है, आसमानी सुगबुगाहट हैरान सी लगती है, वो चहचहाट भी अब अनजानी सी लगती है, वो गिलहरियां भी अब परेशान सी लगती है! नीचे जो सुखी मिट्टी थी वो अब कातिलाना लाल है, ये रंग इस गांव में नया है, कमाल है! टोलियों में बट गए  पंक्षी क्यों ये सवाल है। हर सवान में ये राहें कितना सजती सवरती है, क्या - कोई राजनीतिक रंजिश पुरानी सी लगती है? इन फ़िज़ायों में क्यों कोई ईर्ष्याग्रस्त राज़ है नया सा ये पुरानी भूली सड़क क्यों  अब वीरानी सी लगती है? खिड़कियों से बाहर , पेड़ो की टहनियों से! अनुभव कुमार मिश्रा ताबीर 27/8/18

बस्ता

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एक फटे पुराने बस्ते से यादों की किताबें मिली है, धूलों की चादर में लिपटे , पन्नो में एक अजीब सी नमी है, दिन गुज़र गए कितने , और जज़्बाती इन जालों में अब वो पल भी तो नही है, लिखा पढ़ा धुंधला सा है अब और वो चिठ्ठी भी गुम कही है, पर कुतरा हुआ सा वो मैला सा बस्ता, फटा चिथड़ा ही सही, आज भी वहीं है, जैसे वक्त वो तेरा- मेरा मानो यही कहीं है। एक फटे पुराने बस्ते से यादों की किताबें मिली हैं -ताबिर- 5/6/18 अनुभव मिश्रा

वो स्कूल का एक अफसाना

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वो नज़र चुराना ,वो नज़र मिलाना वो स्कूल का अफ़साना तड़पते दिल से मिलने को सुबह क्लास जल्दी से आना, और उसकी नोटबुक में एक प्यारी चिट्ठी छोड़ जाना, कॉरिडोर से निकले जब वो दोस्तो संग मेरे साथियो का यूँ गुदगुदाना जैसे हो एक नया फसाना, उसके गिरे रुमाल को फिर धीरे से चुराना रुमाल का फिर इश्क़ ए पोशाक बनाना, यूँ ज़ुल्फो की हरकतों में खो के सोडियम को वाटर में मिलाना, खिलखिलाती हसी में उसकी, शेक्सपियर और पैथगोरस की केमिस्ट्री बनाना, सुरमयी आंखों की गहराई में फिर पुलि के सहारे उतर जाना,  पिछले पन्ने पे पढ़ नाम एक संग दिल की धड़कन का यूँ बढ़ जाना , उफ्फ मेरा वो शर्माना फिर क्वेश्चन के बहाने मिलना और उसके हाय से डर जाना वापस जाने को पैदल संग संग खुद की साइकिल पंचर कर जाना, गुज़रे जब मुहल्ले से उसके मिलने को ट्यूशन के बहाने, शरीर का यूँ थार्थराना और कपकपाना, दीदार ए सूरत हो रात में यूँ सपनो में संग उसके बड़बड़ाना, शुक्राल्लाह , कल फिर से स्कूल है वरना तय था मेरा मर जाना। फिर से वही नज़रे चुराना , वही नज़रे मिलाना! वही स्कूल का एक अफसाना। ~ताबिर~ 30/01/2018

अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं

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चलते चलते, इन उम्मीदों के ओस तले दबे, सपनो की कई पर्त संभाले, बीते हुए पल को कही दूर छुपाये, धूपों में कल की हसरतें सँवारे जाने क्यों, इस राह पर यूँ ही, चलते चलते अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं। चलते चलते, सर्द हवाओं में मोहब्ति चाय को चुस्की लेते, कुछ एहम नन्ही ज़रूरतों का हिसाब देते, कुदरती धुंद की आगोश में, उस बरगद को लिपटा देखते, और देखकर उस लाल तप में सब कुछ राख होते, जाने क्यों, इस राह पर यूँ ही, चलते चलते अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं। चलते चलते रिमझिम बरसात की सुगबुगाहट में मय्यसर ताबीर के डूब जाने की आहट में, जिंदगी साँचने की चाहत में और उसे वापस बुलाने की हसरत में, जाने क्यों, इस राह पर यूँ ही, चलते चलते अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं। ताबीर 13/1/18