वीरानी सड़क

खिड़कियों से बाहर ,पेड़ो की टहनियों से
वो हवा कुछ अलग सी मालूम होती है!
पत्तियों की सरसराहट में कोई ,
अफवाहि तूफान का पैगाम सा लगता है,
आसमानी सुगबुगाहट हैरान सी लगती है,
वो चहचहाट भी अब अनजानी सी लगती है,
वो गिलहरियां भी अब परेशान सी लगती है!

नीचे जो सुखी मिट्टी थी वो अब कातिलाना लाल है,
ये रंग इस गांव में नया है, कमाल है!
टोलियों में बट गए  पंक्षी क्यों ये सवाल है।
हर सवान में ये राहें कितना सजती सवरती है,
क्या - कोई राजनीतिक रंजिश पुरानी सी लगती है?
इन फ़िज़ायों में क्यों कोई ईर्ष्याग्रस्त राज़ है नया सा
ये पुरानी भूली सड़क क्यों  अब वीरानी सी लगती है?

खिड़कियों से बाहर , पेड़ो की टहनियों से!

अनुभव कुमार मिश्रा
ताबीर
27/8/18

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