अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं
चलते चलते,
इन उम्मीदों के ओस तले दबे,
सपनो की कई पर्त संभाले,
बीते हुए पल को कही दूर छुपाये,
धूपों में कल की हसरतें सँवारे
जाने क्यों, इस राह पर यूँ ही, चलते चलते
अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं।
चलते चलते,
सर्द हवाओं में मोहब्ति चाय को चुस्की लेते,
कुछ एहम नन्ही ज़रूरतों का हिसाब देते,
कुदरती धुंद की आगोश में,
उस बरगद को लिपटा देखते,
और देखकर उस लाल तप में सब कुछ राख होते,
जाने क्यों, इस राह पर यूँ ही, चलते चलते
अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं।
चलते चलते
रिमझिम बरसात की सुगबुगाहट में
मय्यसर ताबीर के डूब जाने की आहट में,
जिंदगी साँचने की चाहत में
और उसे वापस बुलाने की हसरत में,
जाने क्यों, इस राह पर यूँ ही, चलते चलते
अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं।
ताबीर
13/1/18
इन उम्मीदों के ओस तले दबे,
सपनो की कई पर्त संभाले,
बीते हुए पल को कही दूर छुपाये,
धूपों में कल की हसरतें सँवारे
जाने क्यों, इस राह पर यूँ ही, चलते चलते
अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं।
चलते चलते,
सर्द हवाओं में मोहब्ति चाय को चुस्की लेते,
कुछ एहम नन्ही ज़रूरतों का हिसाब देते,
कुदरती धुंद की आगोश में,
उस बरगद को लिपटा देखते,
और देखकर उस लाल तप में सब कुछ राख होते,
जाने क्यों, इस राह पर यूँ ही, चलते चलते
अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं।
चलते चलते
रिमझिम बरसात की सुगबुगाहट में
मय्यसर ताबीर के डूब जाने की आहट में,
जिंदगी साँचने की चाहत में
और उसे वापस बुलाने की हसरत में,
जाने क्यों, इस राह पर यूँ ही, चलते चलते
अक्सर ख़ौफ़ज़दा हो जाता हूं मैं।
ताबीर
13/1/18

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